Saturday, November 2, 2019

एक शेर था मेरे धरती माँ का


एक शेर था मेरे धरती माँ का
कहते थे सरदार जिसको
जिसने माँ के अंग बचाएं
होने ना दिया तितर-बितर इसको

इसने अपनी जो कमर थी कसली
चाहे बात हो असली या नकली
हर हाल में इसने राह बनाया
एक भारत करके दिखाया

नदियों का इसने रुख है मोड़ा
समय को भी पीछे छोड़ा
भविष्य को सोच कर्म किया ऐसा
भारत को अपना धर्म दिया ऐसा

की आजादी का स्वाद चखे हम
अपनी माँ को सवार सके हम
एक मौका हो जरूर हमारे हाथ
ताकि लिख पाए एक नया इतिहास